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सामाजिक सरोकार

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sanjeev sharma


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गजानन, अब के बरस तुम मत आना

Posted On: 30 Nov, 2013  
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कैसा हो यदि सुरीला हो जाए वाहनों का कर्कस हार्न…!!!

Posted On: 30 Nov, 2013  
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ये प्यार है या फिर क्षणिक वासना का आवेग

Posted On: 3 Aug, 2013  
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हे भगवान,यह क्या सिखा रही है मेट्रो ट्रेन हमें…?

Posted On: 25 Jul, 2013  
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क्या किसी समाज का इससे अधिक नैतिक पतन हो सकता है

Posted On: 14 Apr, 2013  
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सुशीला,मुनिया और गूंगों का दफ़्तर

Posted On: 30 Mar, 2013  
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‘महालेखन’ पर महाबातचीत की महाशैली का महाज्ञान

Posted On: 2 Mar, 2013  
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क्या हम सब भी बलात्कारियों से कुछ कम हैं..?

Posted On: 2 Mar, 2013  
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महाकुंभ से कम नहीं है बंगलुरु का हवाई जहाजों का कुंभ

Posted On: 2 Mar, 2013  
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के द्वारा: sanjeev sharma sanjeev sharma

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मनुष्य एक एैसा जीव है जिसमैं एक खरगोश से लेकर सिंह तक के गुण  होते हैं जो प्रक्रतिक रूप मै विद्धयमान होते हैं वह कही खरगोश तरह डरपोक होता है तो कहीं सिंह के समान हिंसक ,,,, कहीं भालू,, तो कहीं विसैला जीव ,,  ,,,संसकार विहीन ,,,समाज मैं फैली कुशिक्षा ,,,,नैतिक शिक्षा का अभाव ,,,,समाज से    घर परिवार से     सताये लोगों के मन  का आक्रोश ,,,,,वर्ण संकरता ,,,,  उत्तेजक खानपन ,,,,,,,बेलगाम फिल्मी हिंसक द्रष्य,,,,,,,,,,,शारीरिक    गठन        ,,,ज्योतिष के हिसाब से पुर्व जन्म के संसकार  ,,ग्रह स्तिथीयां     हमैं प्राक्रतिक रूप से  ,,,वैसा  ही करवा देती हैं  ,,,,यह प्राक्रतिक रूप से स्वतः ही होता रहता है  और  अच्छे का या बूरे कर्मों का संतुलन अपने    आप ही होता रहता है   ,,कितनी ही अच्छी शिक्षा दैं कितने ही अच्रछे संसकार दें सब एक ही मित्र ,,, एक ही,,घर का नया सदश्य    ,,फिल्म ,,आदि सब कुछ  धल धूसरित कर देता है   कितना ही सुसंस्क्रत परिवार क्यों ना हो  स्वभाविक  दुषकर्म  से एक ना एक  सदश्य अवष्य हो जाता है  ,,,,,,,,,,,हम यही कह सकते हैं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ओम    शांति ,,, शांति  ,,,,शांति     ,,,,,,,,,, हर रात का अंत सुबह है ,,,,हर पाप का अंत पुण्य होगा ,,,,,,,,,अम्रत पान कर चूके महापापी रावण का भी अंत हुआ  था यही विचार कर सो जाते है    ,,,,,,,,,,,,,,,,,,संजीव जी ,,,,,,,परेसान ना हौं ,,,,,-------------,,,,,,,,,,,,,,-------------

के द्वारा: hcsharma hcsharma

मजनूं ने तो लैला पर कभी चाकू-छुरी नहीं चलाई? न ही कभी तेज़ाब फेंका? उलटे जब मजनूं से जमाना रुसवा हुआ तो लैला ढाल बन गई,पत्थरों की बौछार अपने कोमल बदन पर सह गयी.तभी तो उनका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज है.इसीतरह न ही कभी महिबाल को सोहिनी पर और न ही हीर-राँझा को एक दूसरे पर कभी शक हुआ और न ही एक-दूसरे को मरने मारने की इच्छा हुई. वे तो बस एक दूसरे पर मर मिटने को तैयार रहते थे.एक दूसरे की खुशी के लिए अपना सुख त्यागने को तत्पर रहते थे. वे कभी एक दूसरे के साथ मुकाबले,प्रतिस्पर्धा,ईर्ष्या,द्वेष और जलन में नहीं पड़े. यह भी उस दौर की बात है जब प्रेमी-प्रेमिका का मिलना-साथ रहना तो दूर एक झलक पा जाना ही किस्मत की बात होती थी.तमाम बंदिशें,बाधाएं,रुकावटें,सामाजिक-सांस्कृतिक बेड़ियों के बाद भी वे एक दूसरे पर कुर्बान हो जाते थे. मीरा ने कृष्ण के प्रेम में हँसते-हँसते जहर का प्याला पी लिया था. प्रेमी का अर्थ ही है एक-दूसरे के हो जाना,एक-दूसरे में खो जाना,एक-दूसरे पर जान देना और दो शरीर एक जान बन जाना, न कि एक दूसरे की जान लेना. प्रेम होता ही ऐसा है जिसमें अपने प्रियजन के सम्बन्ध में सवाल-जवाब की कोई गुंजाइश ही नहीं होती. आज के आधुनिक दौर में जब युवाओं को एक–दूसरे के साथ दोस्ती बढ़ाने,घूमने-फिरने,साथ रहने और सारी सीमाओं से परे जाकर एक- दूसरे के हो जाने की छूट हासिल है उसके बाद भी उनमें अविश्वास का यह हाल है कि जरा सी नाराजगी जानलेवा बन जाती है, किसी और के साथ बात करते देख लेना ही मरने-मारने का कारण बन जाता है. जिससे आप सबसे ज्यादा प्यार करने हैं उस पर तेज़ाब फेंकने की अनुमति आपका दिल कैसे दे सकता है फिर आप चाहे उससे लाख नाराज हो.अब तो लगता है कि ‘इंस्टेंट लव’ ने प्यार की गहराई को वासना में और अपने प्रेमी पर मर मिटने की भावना को मरने-मारने के हिंसक रूप में तब्दील कर दिया है. शिक्षा के सबसे अव्वल मंदिरों में ज्ञान के उच्चतम स्तर पर बैठे युवाओं का यह हाल है कि वे प्रेम के ककहरे को भी नहीं समझ पा रहे और क्षणिक और दैहिक आकर्षण को प्यार समझकर अपना और अपने साथी का जीवन बर्बाद कर रहे हैं. शायद यही कारण है कि इन दिनों समाज में विवाह से ज्यादा तलाक़ और प्रेम से ज्यादा हिंसा बढ़ रही है.मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि समाज एवं परिवार से कटे आत्मकेंद्रित युवाओं में किसी को पाने की इच्छा इतनी प्रबल हो गयी है कि वे इसके लिए बर्बाद होने या बर्बाद करने से भी पीछे नहीं हटते. क्षणिक सुख की यह ज़िद समाज में नैतिक पतन का कारण बन रही है और इससे प्रेम जैसा पवित्र,पावन और संसार का सबसे खूबसूरत रिश्ता भी कलंकित हो रहा है., ये प्यार असल में वासना ही है संजीव जी ! बहुत बेहतरीन लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

के द्वारा: sanjeev sharma sanjeev sharma

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के द्वारा: jlsingh jlsingh

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चौथे स्तंभ को तो विज्ञापनों के लालच में काबू में किया जा सकता है परन्तु न्यू मीडिया या पांचवा स्तंभ तो पूरी तरह से स्वतंत्र है और यदि एक बार इसने अपनी जड़ें जनमानस के मन में गहरे तक जमा ली तो फिर उसे किसी तरह रोक पाना/डराना/धमकाना असंभव हो जायेगाचौथे स्तंभ को तो विज्ञापनों के लालच में काबू में किया जा सकता है परन्तु न्यू मीडिया या पांचवा स्तंभ तो पूरी तरह से स्वतंत्र है और यदि एक बार इसने अपनी जड़ें जनमानस के मन में गहरे तक जमा ली तो फिर उसे किसी तरह रोक पाना/डराना/धमकाना असंभव हो जायेगा - सरकारें नहीं चाहती की लोकत्रंत्र मज़बूत हो. लेकिन यह उनके वश की बात नहीं है. वेसे आपातकाल दुहराने के पुरे चांस है.

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प्रिय संजीव जी वंदेमातरम ! मैं इतने ढेर सारे अखबार नहीं पढ़ता । आपके द्वारा दी गयी हेडिंग पर कुछ कहना चाहूंगा । पंजाब केसरी,दिल्ली “जहाँ रामलला विराजमान वही जन्मस्थान ” नईदुनिया,दिल्ली “वहीँ रहेंगे रामलला” दैनिक ट्रिब्यून “रामलला वहीँ विराजेंगे” अमर उजाला,दिल्ली “रामलला विराजमान रहेंगे” दैनिक जागरण,दिल्ली “विराजमान रहेंगे रामलला” हरि भूमि.दिल्ली “जन्मभूमि श्री राम की” दैनिक भास्कर,दिल्ली “भगवान को मिली भूमि” उपरोक्त अखबारों ने तीनों माननीय जजेज ने जो बहुमत से निर्णय दिया वही हेडिंग दी है, फिर ये हेडिंग कम्युनल कैसे हो गयी । उपरोक्त अखबारों ने बहुमत से दिये गये निणर्य का जिक्र किया है । जनसत्ता,दिल्ली “तीन बराबर हिस्सों में बटें विवादित भूमि” राष्ट्रीय सहारा,दिल्ली “तीन हिस्सों में बटेंगी विवादित भूमि” हिंदुस्तान,दिल्ली “मूर्तियां नहीं हटेंगी,ज़मीन बटेंगी” नवभारत टाइम्स ,दिल्ली “किसी एक की नहीं अयोध्या” उपरोक्त अखबारों ने भी न्यायालय के निर्णय पर ही हेडिंग दी है । जस्थान पत्रिका,जयपुर(दिल्ली में उपलब्ध) “राम भी वहीँ,रहीम भी” बिजनेस स्टैण्डर्ड.दिल्ली “अयोध्या में राम भी इस्लाम भी” इकनामिक टाइम्स,दिल्ली “बंटी ज़मीन,एक रहे राम और रहीम” पर इन अखबारों ने न्यायालय के निणर्य का मनमुताबिक निवर्चन करके माननीय उच्चन्यायालय के निर्णय से असम्मत होने का न सिर्फ प्रमाण दिया है बल्कि अपनी छद्यम धर्मनिरपेक्षता का ढोल खुद ही पीटा है । जब आप धर्मनिरपेक्षता का नाटक करते हुये एक पक्ष की समीक्षा करते हैं तब आप अनजाने में या जानबूझ कर दूसरे पक्ष की भाषा बोलने लगते हैं और साम्प्रदायिक हो जाते हैं । अखबारों के बढ़िया विश्लेष्ण के लिये धन्यवाद ।

के द्वारा: kmmishra kmmishra

के द्वारा: upendraswami upendraswami

प्रिय संजीव जी, आप की इन पंक्तियों से मैं शतप्रतिशत सहमत हूं - विज्ञापनों में महिलाओं का इस्तेमाल हालाँकि कोई नई बात नहीं है. इन दिनों टीवी पर दिखाए जा रहे डियोडेरेन्ट और परफ्यूम के विज्ञापनों में हमें जिस स्त्री के दर्शन हो रहे हैं वह कहीं से भी हमें अपनी सी नहीं लगती. यौन-उन्मांद से रची-बसी ये महिलाएं एक खास कंपनी के उत्पाद का इस्तेमाल करने वाले पुरुषों पर हमला सा करती नज़र आती हैं,उसे देखकर आहें भरती हैं, ऐसी भाव-भंगिमाएँ प्रदर्शित करती हैं मानो उनके जीवन में यौन संबंधों के अलावा और कुछ नहीं है। पर संजीव जी आज के हमारे भारतीय समाज को खासकर स्‍त्रीयों के पहनावे एवं रंग-ढंग आदि यदि आप देखें तो यह पूर्णत: विदेशी रंग में रंग चुका है। और तो और शहरों की सीमाएं लांध कर यह गांवों को भी अपनी गिरफत में ले चुका है। और इस नंगेपन को बढ़ावा देने वाले यह टी;वी; विज्ञापन, सीरियल, विदेशी फिल्‍में एवं इंटरनेट बहुत सहायक है। इस विषय में में यहां अपनी एक स्‍वंरचित कविता की कुछ पंक्तियां यहां लिख रहा हूं जो बहुत जल्‍द आप को इस ब्‍लाग पर पढ़ने को मिलेगी पर्दा लज्‍जा सब खत्‍म हुई आंचल का दायरा बदल गया चुन्‍नी को हटा अब सूट से इस नए फैशन की दौड़ में टी-शर्ट को सहारा बना लिया। एक अच्‍छे विषय को सामने लाने के लिए धन्‍यवाद। दीपक जोशी

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

संजीव जी वंदेमातरम । इन दिनों टीवी पर दिखाए जा रहे डियोडेरेन्ट और परफ्यूम के विज्ञापनों में हमें जिस स्त्री के दर्शन हो रहे हैं वह कहीं से भी हमें अपनी सी नहीं लगतीण् आपक कहना सही है । ये स्त्रियां कहीं से भी भारतीय नहीं लगती है । लेकिन इसके साथ ही क्या आपने गौर किया कि इन विज्ञापनों में विवाहित स्त्रियों को भी ललचाई नजरों से यौनोन्मुख होते दिखाया जा रहा है । जैसे भारतीय स्त्री हर कामुक पुरूष को देख कर लार टपकाती हो । इन विज्ञापनों की घोर निंदा और विरोध होना चाहिये । आभार । कश्मीर के अलगाववादियों और आतंकियों को क्या मानवाधिकार प्राप्त होना चाहिये । इस बहस में भाग लेने के लिये ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ इस लेख पर अपने विचार रखें ।

के द्वारा: kmmishra kmmishra

बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है आप ने , शायद ही किसी का ध्यान इस तरफ गया हो, यह सच भी हो सकता है की हमारे छोटे मोटे धंधे तोड़ने की यह साजिश हो !! किसी का भरोसा नहीं किया जा सकता, मीडिया का एक वर्ग देश को कमज़ोर करने पर तुला है, मुस्लिम तुष्टिकरन, मुस्लिम आतंकवाद का हव्वा आदि ऐसा दिखाया जाता है जैसे पता नहीं क्या हो रहा हो ,, आप देखे नक्सल हिंसा आदि की खबरे इतना स्थान नहीं पाती है ना ही उनको ज़न्नातेदार म्यूजिक और ग्राफिक्स के साथ पेश किया जाता है !! पूर्वोत्तर की स्थिति जो अत्यंत गंभीर है मीडिया में इतना हॉट issue नहीं है, चीन की करतूतों को नज़रंदाज़ किया जाता है क्यों ? क्यों की शायद यह मीडिया की TRP rating बढाने में उतनी सहायक नहीं है !! http://rashid.jagranjunction.com

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शर्मा साहब आपने पते की बात कही है अपने लेख में…बधाई । यह सही है कि अधिकांश मिलावट की खबरें विगत दो वर्षों से ही ज़्यादा चर्चा में आ रही हैं । ऐसा ही कुछ बर्ड-फ़्लू और स्वाइन-फ़्लू के हौवों के तहत भी हमने महसूस किया है । देसी व्यापारियों की करोड़ों मुर्गियाँ बर्ड-फ़्लू से तो पता नहीं, पर मार दी गईं जिससे मुर्गे का भाव दो गुना होने के बाद फ़िर नीचे नहीं आया । आज तक किसी आदमी के बर्ड-फ़्लू से मरने की खबर का इंतज़ार है । इसी प्रकार स्वाइन-फ़्लू पूरी दुनिया में फ़ैला ज़रूर, परन्तु कम से कम भारत में किसी के मरने की खबर मैने आज तक नहीं पढ़ा । दोनो मामलों में दवा कम्पनियों के ही वारे-न्यारे हुए । ये मामले गूढ़ अनुसन्धान का विषय हो सकते हैं, पर ईमानदारी से अनुसन्धान कराना कौन चाहेगा? वे, जो स्वयं अनुसन्धान का विषय हैं ? हम शायद फ़िर उसी ओर जा रहे हैं, जहाँ से चले थे……आर.एन. शाही । shahirn.jagranjunction.com

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बहुत खूब. महंगाई आज का रोना नहीं है, 1974 की मनोजकुमार की फिल्म रोटी-कपडा और मकान में इसी बात का रोना रोया जा चुका है, अब ३६ साल बाद भी स्थिति वैसी ही है.कि झोला भरकर पैसा ले जाओ, और मुट्ठी में सामान ले आओ. इस बात पर राष्ट्रीय बहस होना चाहिए कि जब देश वही है, उत्पादन वही है, तो आखिर महंगाई क्यों बढ़ रही है? किसी भी सरकार की प्राथमिकता सबसे पहले सड़क होना चाहिए उसके बाद बिजली और paani, मदर आज़ादी के 63 साल बाद भी न सड़क है, न पानी, न बिजली. विकास की कितनी कीमत वसूली जायेगी, आश्चर्य होता है कि हर साल देशवासियों से अरबों रूपये के टैक्स वसूले जाने के बाद भी देश पर विदेशी कर्ज़ा हर साल बढ़ता जा रहा है.देसी घी तो वैसे भी अभी से म्यूजियम में रखने लायक दुर्लभ खाद्य हो चुका है, यदि आज किसी को शुद्ध देसी घी खिला दिया जाए तो वह बीमार पद सकता है, दरअसल हमारा शरीर भी अब धीरे-धीरे इन चीज़ों को हज़म करने की क्षमता खो चुका है, इन चीज़ों के बारे में ज़्यादा लिखने-पढने से भी बीमार हो सकते हैं. आपका धन्यवाद कि आपने अरसे बाद घी की याद दिलवाई, मनो-मस्तिष्क पर इसकी यादें धुंधला सी गईं थी.

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के द्वारा: kmmishra kmmishra




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